अधिकमन रे तू सत समागम कीजे
अधिकहो आज सुख सागर नहावा ये
अधिकहो गुरु देव सम उपकार, हमने देखियो न सुण्यो हेली
अधिकसत गुरु उर आसन करो होजी, देवो अनुभव अपार