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सत गुरु उर आसन करो होजी, देवो अनुभव अपार

 पद राग बधावा मल्हार नं॰ ७३

सत गुरु उर आसन करो होजी, देवो अनुभव अपार।
अनहद बाजा घूररया, खुलिया ब्रह्म बिचार॥टेर॥

बेगम पुर के बाजार में होजी, साहु अनत अपार।
सत गुरु मिल सौदा रच्या होजी हूँडिया दीवि है शिकार॥१॥

आप आडतिया अगम का होजी, भरज्यो माल अपार।
तन मन धन अर्पन करुँ होजी करो हरी हंस उधार॥२॥

अधम उधारण आविया होजी, ईश्वर लियो अवतार।
पारब्रह्म पुरुषोतम होजी सब संतन के सरदार॥३॥

भक्ति मुक्ति दाता सदा होजी, सम संतोष विचार।
चौथी सत संग देवजो होजी, गुरु दीनन के दातार॥४॥

है विश्व व्यापक हो रह्मा होजी, कुदरत करे है सुधार।
श्री नारायण गुरु देव होजी, स्वामी दीप कहे है पुकार॥५॥