मन परतीत कोनी आवे रे
पद राग रसिया नं॰ १३१
मन परतीत कोनी आवे रे।
कपटी रे लपटी कली के मानुष, सौगन सतगुरु सा री खावे रे॥टेर॥
जीवत ही दु:ख भोगे रे जगत में, मुवा पछे नरक सिधावेरे।
समझ बिना साची नहीं दाखे, गेबी गोता खावे रे॥१॥
अन्दर मांही पाप बिराजे, उल्टी बखाने रे।
कर्म लिपावे कला रे गमावे, वाने लाज कोनी आवे रे॥२॥
माणक मूंगा मोल को है, मूरख धूल में गमावे रे।
स्वामी दीप सदा ही शरणगत जगत मने झूटली लखावे रे॥३॥