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सत गुरु स्वामी से लागी है परीत, और कोनी मन भावे

 पद राग मांड नं॰ ९५

सत गुरु स्वामी से लागी है परीत, और कोनी मन भावे।
म्हारा ध्रुव हो पूर्वला हो सैन, निरख्या सू नैन हरसावे॥टेर॥

म्हारा दिल मांही घणी है उम्मेद कैने से थाग कोनी आवे।
हंसा जाज्ञा पूर्बला हो भाग हम किम बिसरावे॥१॥

मानुष तन मोल है अमोल, समझ बिन दु:ख पावे।
मानो जनम मरण मिट जाय, फेर पाछो कोनी आवे॥२॥

श्री पूज्य देवपुरी सा महाराज, अमर पद परसावे।
श्री स्वामी दीप करे वो अरदास, चरण रज गंग नहावे॥३॥