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सत गुरु ऐसा राम ऐसा

 पद राग वारा हंस नं॰ ८७

सत गुरु ऐसा राम ऐसा।
अमृत बूंदा हद बरसावे, गरजे इन्द्र जैसा॥टेर॥

ऊच नीच भाव नहीं उनके, सम जाने रंक नरेशा।
जीवों के त्रय ताप हरत है, तनिक लोभ नहीं लेशा॥१॥

मोटा की मरियाद अटल है, घूम रहा गज जैसा।
जीवन मुक्त परम कृपालु, रखे न राग द्वेसा॥२॥

ब्रह्म निष्ठ गुरु ब्रह्म अखण्डा, ध्यान धरे शिवशेषा।
वारीवृति अचल सदाई स्थिर है मेरु जैसा॥३॥

अंतर बाहिर त्यागी पूर्ण, गहे न दारा पैसा।
भव भंजन भगवान सदा ही, काटे परम कलेशा॥४॥

हंस उबारण जग में आये, शुभ अवतार धरेशा।
श्री दीप कहे गुरु देव नमामी, बारम्बार आदेश॥५॥