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शोभा वो सतसंग री, जहां बड भागी जन पाय

 पद राग हिंडोर नं॰ ४५

शोभा वो सतसंग री, जहां बड भागी जन पाय॥टेर॥

जैसे लट भृंगी मिले वो, शब्द गुंजार सुनाय।
गुंज बीज के भेद से भृंगी होय उड जाय॥१॥

पारस संग लोहा करे वो अंग से अंग मिलाय।
सुसंगति का फल मिलेजी शुद्ध कँचन हो जाय॥२॥

नीचा पाणी आय मिले वो, भागीरिथी के माँय।
मिलत पवित्र होत है वो गंगाजल कहलाय॥३॥

और वृक्ष चन्दन मिले वो, मलियागर कहवाय।
श्री स्वामी दीप कहे सतसंग से, परम आनन्द सुख पाय॥४॥